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Thursday, 5 July 2018

Govt closed credit linked capital subsidy scheme | क्रेडिट लिंक्‍ड स्‍कीम बंद होने से छोटे कारोबारी परेशान, मिलती थी 15% सब्सिडी

Govt closed credit linked capital subsidy scheme | क्रेडिट लिंक्‍ड स्‍कीम बंद होने से छोटे कारोबारी परेशान, मिलती थी 15% सब्सिडीमोदी सरकार द्वारा क्रेडिट लिंक्‍ड कैपिटल सब्सिडी स्‍कीम बंद करने से छोटे कारोबारी परेशान हैं। कारोबारियों का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण मंदी के दौर में यह स्‍कीम उन्‍हें सहारा दे सकती थी, लेकिन सरकार ने यह‍ सब्सिडी बंद कर उनकी परेशानी और बढ़ा दी है। नेशनल बोर्ड फॉर माइक्रो, स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज की बैठक में यह मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठा, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस आश्‍वासन नहीं दिया गया। 




फिस्‍मे ने उठाया मुद्दा 
मंगलवार को एमएसएमई मिनिस्‍टर गिरिराज सिंह की अध्‍यक्षता में हुई नेशनल बोर्ड फॉर एमएसएमई की मीटिंग में फेडरेशन ऑफ इंडियन स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (फिस्‍मे) ने यह मुद्दा उठाया। फिस्‍मे के जनरल सेक्रेट्री अनिल भारद्वाज ने moneybhaskar.com को बताया कि सीएससीएसएस को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसके लिए अप्‍लीकेशन नहीं ली जा रही हैं। बैठक में इस मुद्दे को उठा कर यह जानने की कोशिश की गई कि आखिर इस स्‍कीम को लेकर सरकार का क्‍या रूख है। एमएसएमई अधिकारियों ने कहा कि स्‍कीम शुरू की जाएगी, लेकिन कब शुरू होगी, इस बारे में ठोस जानकारी नहीं दी गई । 

क्‍या थी स्‍कीम?
 केंद्र सरकार के मिनिस्‍ट्री ऑफ माइक्रो, स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) ने 2000-01 में क्रेडिट लिंक्‍ड कैपिटल सब्सिडी स्‍कीम फॉर टेक्‍नोलॉजी अपग्रेडेशन शुरू की थी। इस स्‍कीम के तहत एमएसएमई को 1 करोड़ रुपए तक का लोन लेने पर 15 फीसदी (15 लाख रुपए) की सब्सिडी दी जाती है। यह लोन उन करोबारियों को दिया जाता था जो अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए टेक्‍नोलॉजी को अपग्रेड करते थे। इस स्‍कीम का फायदा पहले से आईडेंटिफाई 51 प्रोडक्‍ट्स और सब-सेक्‍टर्स को दिया जा रहा था।

क्‍यों बंद हुई स्‍कीम?
इस बारे में http://moneybhaskar.com ने एक दिसंबर में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि बैंकों का मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई पर करीब 1300 करोड़ रुपए बकाया हो चुका है। ऐसे में, जब पूरी मिनिस्‍ट्री का बजट ही 3 से 4000 करोड़ रुपए के बीच होता है तो मिनिस्‍ट्री इतना पैसा कहां से दे, इस वजह से यह स्‍कीम बंद चल रही है। 

आगे पढ़ें : क्‍या होता था फायदा?
क्‍या होता था फायदा?
छोटे कारोबारियों का कहना है कि यह स्‍कीम बेहद फायदेमंद थी। जो कारोबारी अपने प्रोडक्‍ट्स या सर्विस को अपग्रेड करने के लिए टेक्‍नोलॉजी पर इन्‍वेस्‍टमेंट करता था। वह अगर लोन लेता था तो उसे 15 फीसदी तक सब्सिडी मिल जाती थी।

987 करोड़ सब्सिडी रिलीज 
मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई के एनुअल रिपोर्ट 2016-17 के मुताबिक, क्रेडिट लिंक्‍ड कैपिटल सब्सिडी स्‍कीम के तहत 2014 से 2016 (31 दिसंबर 2016 तक) के दौरान 15 हजार 684 कारोबारियों को 987.72 करोड़ रुपए की सब्सिडी रिलीज की गई। 







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PSUs are not giving delayed payments to MSEs | कॉरपोरेट से SME का पैसा नहीं दिला पा रही सरकार, 870 करोड़ में से मिले 24 लाख

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 दिल्‍ली। बड़ी कंपनियां पर छोटे कारोबारियों का बकाया बढ़ता जा रहा है। इसके लिए माइक्रो, स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट एक्‍ट भी छोटे कारोबारियों के काम नहीं आ रहा है और ना ही सरकार के प्रयास काफी साबित हो रहे हैं। छोटे कारोबारी लगभग 870 करोड़ रुपए बकाया दिलाने के लिए सरकार के पास शिकायत कर चुके हैं, लेकिन इसमें से केवल 24 लाख रुपए ही सरकार दिला पाई है।



क्‍या है वस्‍तु स्थिति
बड़ी कंपनियां (जिनमें सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं) पर आरोप है कि वे छोटे कारोबारियों से काम तो करा लेती हैं, लेकिन निर्धारित समय पर उनको पेमेंट नहीं करती। एमएसएमई डेवलपमेंट एक्‍ट में प्रोविजन है कि छोटे कारोबारियों को 45 दिन के भीतर पेमेंट की जाएगी, लेकिन बड़ी कंपनियां 150 दिन से अधिक समय लगा देती हैं। छोटे कारोबारियों के संगठन लगातार इसकी शिकायत करते रहे हैं, जिसके बाद मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई ने अक्‍टूबर 2017 में एक ऑनलाइन मॉनीटरिंग पोर्टल 'समाधान' की शुरुआत की है।

क्‍या कहते हैं आंकड़ें
समाधान पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 3591 छोटे कारोबारियों ने इस पोर्टल पर अपनी एप्‍लीकेशन फाइल की हैं। जिसमें उन्‍होंने बड़ी कंपनियों पर 870.90 करोड़ रुपए के बकाया होने की शिकायत की है। अब तक इसमें से केवल 6 एप्लीकेशन को डिस्‍पोज किया गया है, जिन्‍हें लगभग 24 लाख रुपया दिलाया गया है। इसके अलावा 133 कारोबारियों और बड़ी कंपनियों ने आपस में समझौता कर लिया और छोटे कारोबारियों को लगभग 12 करोड़ 27 लाख रुपए मिल गए।

रिजेक्‍ट कर रही है कौंसिल
एमएसएमई समाधान में छोटे कारोबारियों की शिकायत को 15 दिन के बाद राज्‍यों में गठित माइक्रो एंड स्‍मॉल एंटरप्राइजेज फेसिलिटेशन कौंसिल (एमएसईएफसी) को भेज दी जाती है। आंकड़ें बताते हैं कि 3591 में से 2206 एप्‍लीकेशन एमएसईएफसी को भेजी जा चुकी हैं, लेकिन इनमें से केवल 411 एप्‍लीकेशन को केस में कंवर्ट किया गया है और 387 एप्‍लीकेशन को तो रिजेक्‍ट ही कर दिया गया है।

बोर्ड मीटिंग में उठेगा मामला
सोमवार को होने वाली नेशनल बोर्ड फॉर एमएसएमई की बैठक में डिले पेमेंट का मामला उठेगा। हालांकि एजेंडे में मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई द्वारा एमएसएमई समाधान पोर्टल के बारे में बताया जाएगा, लेकिन इस मुद्दे पर सरकार को एसएमई संगठनों का विरोध झेलना पड़ सकता है।

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मार्केटिंग स्ट्रैटजी


वॉलमार्ट की मार्केटिंग स्ट्रैटजी सबसे अलत होती है। 'एवरीडे लो प्राइस' यानी हर रोज कम प्राइस उनकी टैगलाइन है जो कस्टमर को अट्रैक्ट करने के लिए बनाई गई है। वह प्रोडक्ट रेन्ज डिस्काउंट प्राइस के कस्टमर को मेल करता है। वह अनसोल्ड स्टॉक को हैवी डिस्काउंट पर बेचता है।


अब 50 से अधिक देशों में है कारोबार


वॉलमार्ट ने अपना पहला इंटरनेशनल स्टोर मेक्सिको सिटी में 1991 में खोला। अब उसका कारोबार 50 से अधिक देशों में है। वॉलमार्ट का कारोबार प्यूर्तोरिको, कनाडा, चीन, ब्राजील, मैक्सिको, जर्मनी, ब्रिटेन, अर्जेन्टीना और अमेरिका में है। इसके अलावा हांग कांग, थाईलैंड, मलेशिया जैसे एशियाई देशों में वॉलमार्ट का स्टोर है। वॉलमार्ट क्लोदिंग, एप्लाएंस, हार्डवेयर, स्पोर्टिंग गुड्स, कन्ज्यूमर ड्यूरेबल, एफएमसीजी सेक्टर के प्रोडक्ट बेचता है।


वॉलमार्ट अपने आप को नहीं रख सकता अमेरिका तक सीमित


वॉलमार्ट अपने आप को अमेरिका तक सीमित नहीं रख सकता। इसके तीन कारण है। पहला, अमेरिकी मार्केट ऐसी जगह पहुंच गई है जहां अब ग्रोथ संभव नहीं है। दुसरा, अमेरिका की जनसंख्या वर्ल्ड की कुल जनसंख्या का 4 फीसदी है। अमेरिका तक सीमित रहने पर वह 96 फीसदी आबादी वाले एरिया की मार्केट खो देगा। तीसरा, उभरती हुई इकोनॉमी जैसे इंडिया वॉलमार्ट के लिए बड़ी रिटेल मार्केट बन सकती है और इसलिए वह इंडिया में एंट्री करने की हर एक कोशिश में लगा हुआ है।
बल्क में खरीदता है प्रोडक्ट


उन्होंने बताया कि वॉलमार्ट बल्क में प्रोडक्ट खरीदता है इससे उसकी कॉस्ट काफी कम हो जाती है। वह अपनी प्रोडक्ट रेन्ज का 50 फीसदी डिस्काउंट पर बेचता है। वह किसी भी देश में कन्ज्यूमर प्रोडक्ट का सबसे बड़ा क्न्ज्यूमर होता है। वह किसी एक वेन्डर पर निर्भर नहीं करता। उसके परचेज वॉल्यूम का 4 फीसदी से अधिक हिस्सा किसी भी वेंडर का नहीं होता। इससे उस वेंडर की मोनोपोली नहीं होती और वॉलमार्ट वेंडर से बारगेन आसानी से कर लेता है।


स्वयं करता है ट्रांसपोर्टेशन


वॉलमार्ट अपने मर्केन्डाइज का 85 फीसदी वॉलमार्ट स्वयं ट्रांसपोर्ट करता है। वॉलमार्ट का स्टोर्स पर सामान भेजने का अपना डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम होता है। वह डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर अपने स्टोर के आसपास की खोलता है ताकि वह एक दिन में स्टोर्स में सामान भेज सके। कंपनी के अपने ट्रक होते हैं। वॉलमार्ट का लॉजिस्टिक सिस्टम इतना अच्छा है कि इससे उन्हें 2 से 3 फीसदी का फायदा कॉस्ट में मिलता है जिससे वह अपने कॉम्पिटीटर से कॉस्ट के मामले में आगे रहता है।


नई दिल्ली। फ्लिपकार्ट के जरिए भारत के ऑनलाइन रिटेल मार्केट में एंट्री करने वाले वॉलमार्ट से देश के 10 लाख ट्रेडर्स डर गए हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार ने डील को रद्द नहीं किया, तो छोटे कारोबारियों के बिजनेस पर खतरा मंडरा जाएगा। कारोबारियों का कहना है वॉलमार्ट अपने  कंपनियों केअधिग्रहण और दाम गिराकर बाजार गिराने की स्ट्रैटेजी के चलते भारत के रिटेल मार्केट पर कब्जा कर सकता है। इसी डर को देखते हुए ट्रेडर्स  सरकार द्वारा  एक्शन नहीं लेने पर कोर्ट जाने की धमकी भी दे रहे हैं। वॉलमार्ट ने इंडियन ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर में खरीदी है।



हर एक देश में हुआ है वॉलमार्ट की एंट्री पर विरोध

वॉलमार्ट इंडिया में आ रहा है और इसका ट्रेडर्स कम्यूनिटी विरोध कर रही है। ऐसा वॉलमार्ट के साथ पहली बार नहीं हो रहा है। वह जिस भी देश में गया है वहां उसका विरोध हुआ है। अपने कॉम्पिटीटर को विफल करने के लिए वॉलमार्ट ने हर एक देश में अलग-अलग स्ट्रैटजी अपनाई है।

ऐसी रही है वॉलमार्ट की स्ट्रैटजी

बड़े प्लेयर को खरीद लेना..

वॉलमार्ट किसी भी देश में एंट्री करने पर उस देश के बड़े रिटेल प्लेयर को खरीद लेता है। ब्रांड गुरू हरीश बिजूर ने moneybhaskar.com को बताया कि वॉलमार्ट ने ऐसा जर्मनी में किया था। वॉलमार्ट ने दिसंबर 1997 में जर्मनी की 21 स्टोर की बड़ी हाइपर मार्केट चेन वर्टकॉफ ( Wertkauf) को खरीद लिया। वह उस समय जर्मनी की बड़ी प्रॉफिटेबल हाइपर मार्केट चेन थी। इसके अलावा अगले दो सालों में इंग्लैंड के टेस्को, जर्मनी के मेट्रो और नीदरलैंड के मैकरो को खरीदने की कोशिशों में लगा रहा। ऐसा ही वॉलमार्ट ने कनाडा में किया और उसने वूल्को रिटेल चेन को खरीद लिया। इससे वॉलमार्ट को लोकल मार्केट में पैर जमाने में हमेशा मदद मिली है।

छेड़ देता है प्राइस वार

वॉलमार्ट अमेरिका में इसलिए सफल हुआ क्योंकि वह ब्रांडेड प्रोडक्ट लो कॉस्ट पर बेचता है और वॉलमार्ट यही फॉर्मूला अन्य देशों में भी अपनाता है। वॉलमार्ट के ब्रांडेड प्रोडक्ट रिटेल से कम कीमतों पर बेचने का नुकसान उस देश के लोकल रिटेलर्स और रिटेल चेन दोनों को हुआ है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के जनरल सेक्रेटरी प्रवीण खंडेलवाल ने moneybhaskar.com को कहा कि अब वॉलमार्ट इंडिया में अपना बिजनेस फैलाने की तैयारी में है इसका ट्रेडर्स विरोध कर रहे हैं क्योंकि इससे ऑनलाइन और रिटेल में प्राइस वार और कॉम्पिटिशन दोनों बढ़ेगा। भारत में ई-कॉमर्स मार्केट पूरी तरह से हैवी डिस्काउंट मॉडल पर आधारित है। ऐसे में कारोबारियों को डर है कि कैशरिच वॉलमार्ट के आने के बाद ये कॉम्पिटिशन और बढ़ेगा।





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